कभी कुछ भी अच्छा लगता है
कभी कुछ भी नहीं
ये मन है या मौसम
मालूम नहीं
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मेरी दुनिया वहीं
कहीं कोने में ही पड़ी है
मेरे सपनों का मोल
निर्धारित है मेरे पैदाइश के पहले से ही
बिक गए कौड़ियों के भाव सब पहली ही खेप में
अकीदतमंद है सिर्फ मेरी मेहनत
काफिर है सारे मेरे ख्वाब
बस कत्ल के लायक
मेरी औकाद
मेरे फटे कपड़े की दहलीज नहीं लांघती कभी
पूरी कोशिश से भी
मेहनत मेरी चमक साहब के चेहरे की
बनाये थे ताजमहल साहब
सारी दुनिया जानती है यही।
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बेकसूर गुनाहगार
मैं खुश हूं तो ग़म किसको है
क्यों तेरे अगोशे-शुकून का गुनाहगार हूँ मैं।
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मेरे रहनुमा ने निकल दिए अपने दहलीज से
मजदूर है हम गरीब
मकान बनाते है
घर पे हमारा हक नहीं।
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