ट्राफिक सिग्नल पे तिरंगे
पता नहीं आजादी के इतने सालो बाद भी
क्यू है भूखे नंगे...
----------> इन्फ़िनिटि
होंठ जनता नहीं कि पेट भूखा है हमारा
मुस्कुरा देता है बेफिक्री में कभी कभी
और हुजूर को लगता है
कि थाली हमारी भी भरी थी कल रात को…
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जिन्दा रहते समझ गए होते ग़ालिब
तो मरना न पड़ता बेमौत..
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चादरे चढती रही तेरे मज़ार पर
चूमे जाते रहे मूर्तियां पत्थरों की
कोई गरीब मर गया कई कई बार
फिर एक बार.
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शब्द तेरे काफूर हो गए जाबब सुन के मेरा.
पहले पता होता तो तो इतना बोलने नहीं दिया होता ....
मेरे दिल में दर्द उठा था अचानक कल रात
मुझे याद कर शायद फिर वो कल रोया होगा.....
-----------------------------------------------> इन्फिनिटी
सच तो तभी बोला है तुमसे से हमने जब
घूँट गयी है अंदर तीखा सा २ यार चार बूँद वाला
वरना हमारी औकत कहा कि
सच बोल सके हम........
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aadami dhirastra ko gahyye hai aur aurate gandhari..
patti bandh liye hai ek ne aur ek andha hai
kitana bhi bura ho jaye dekh ka desh ke logo ka
burana nahi lagata hai... jabatak khud ke ghar me na ghate ghatana..............
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