Saturday, October 3, 2020

गिद्धों की राजनीति


अभी गिद्ध बैठा है
आ के लाश के पास
नोचेंगा जरूर
अभी बस इंतज़ार में है
भीड़ छटने के

#Infinity

Wednesday, September 9, 2020

कामदार


मेरी दुनिया वहीं कहीं कोने में ही पड़ी है
मेरे सपनों का मोल पैदा होने से पहले से निर्धारित थे
बिक गए कौड़ियों के भाव
अकीदतमंद है मेरी मेहनत काफिर है सपने मेरे
बस कत्ल के लायक
मेरी औकाद मेरे फाटे कपड़े की दहलीज नहीं लांघ पाती
साहेब बनाये थे ताजमहल सारी दुनिया यही कहती है।
#Infinity

Saturday, September 5, 2020

बेकसूर गुनाहगार


बेकसूर गुनाहगार 

मैं खुश हूं तो ग़म किसको है
क्यों तेरे अगोशे-शुकून का गुनाहगार हूँ मैं।
#Infinity

Friday, July 31, 2020

शुशांत शांत हो गया


शुशांत शांत हो गया
लटक गया कुनबापरस्ती के रस्सी से
दोस्त थी उसकी कोई
जिसका प्यार फरेब की चाशनी में डूबा जलेबी निकाला शायद
मेधावी था शायद बुद्ध की बुद्धि थी उसमें
तभी हल्के सोंच वालो के बीच जी न पाया
बड़ा अभिनेता बनाता शायद
दिल मे छुड़ी छुपाये
बहरूपीओ के शहर को अलविदा कह चल दिया
अपने चांद पर वाली जमी पे आशियाना बनाने
शुशांत शांत हो गया।

#Infinity

Sunday, May 17, 2020

हमारा हक नही।

मेरे रहनुमा ने निकल दिए अपने दहलीज से
मजदूर है हम गरीब
मकान बनाते है
घर पे हमारा हक नहीं।

#Infinity

Thursday, May 14, 2020

सकारात्मकता

हर जगह नकारात्मकता है बिखरा हुआ
हंसो जैसे चुग लीजिये सकारात्मकता मोती की तरह।

#इंफिनिटी

Monday, May 11, 2020

एक मजूर की मजबूर जिंदगी


मजदूरों गरीबो हक क्या 

बस यही

कि वोट भी दे और जान भी।

#Infinity

मंजिल कहाँ



लोग कहते थे कि ये सड़क जाती है कही
कब  से खड़ा हूँ यहाँ
कि यही का यही हूँ अब भी.

गाँव



गाँव कहता है सबसे, लौट आओ दुबारा
आओ परदेश छोड़े, घर के ईटों को जोड़ें
आओ परदेश छोड़ें, चलें गाँव फ़िर से
माँ क स्नेह मिलेगा, और दुलार बहन का
मिलेगी बगल की शादियों की खुशियाँ.
किसी अपने को अब एक कन्धा मिलेगा
फ़िर खेलेंगे कबड्डी
अमिया तोड़गें, और खायेंगे जामुन
फ़िर से कंचे की खन-खन गूँजा करेगी,
लुक्का-छुप्पी चलेगी, नहायेंगी नदियाँ.
बाबा के कन्धे को, चाहिये अब सहारा,
दादी की कहानियों को कान मिलेगा.
अपने खेतों की मीठी खुशबू मिलेगी
दौड़ेंगे भागेंगे, तेज बहुत तेज फ़िर से,
पतंगे उड़ेंगी, चलेंगी गुलेलें.
बहन बाँधेगी, राखी चहक के
चाची फ़िर गायेगी गीतों कि लड़ियाँ
कन्धे पे घूमेंगे चाचा के फ़िर से,
अब कोई यहाँ न गैर होगा.
चलो आओ, गाँव अकेला पड़ा है,
नीरस, अकड़ा और मरा - सा पड़ा है,
चल के फ़िर से उसे जिंदा करें हम,
अपने लोगों की टूटी खुशियाँ लौटाए
अपनी खुशियों के घुटते दम को फ़िर से
निर्गुण, निर्दोष शुरुआत दे आएँ
चलो आओ फ़िर हम
एक बार गाँव हो आ
बहुत दूर से पत्थर घसीट
कर लाया हूँ
न जाने फिर मै यहाँ
किस फ़िराक में आया हूँ
रास्ते फिर मिल जाएंगे
मंजिले खुद चली आएगी
किसी सागर कि तलाश में
फिर लौट आया हूँ