Sunday, December 27, 2015

घर पे बची है बूढी आँखे इंतज़ार में

छत पे कोई नहीं जाता अब खेलने
शोर करने
ऊपर जाती सीढ़ियों पर
जम गई है बहुत सारी धूल
कुछ बुजुर्ग कदम जाते है
अब ऊपर शाम को
निशान है पड़े है निरीह सीढियो पर पैरो के
जाते है  इंतज़ार करने
आता नहीं है कोई
शायद बेटे बहूँ बच्चे आ रहे होंगे इस रास्ते
या कोई बेटी मायका की तरफ निकली हो कहीं
घर में बचे है बुजुर्ग समय है जिनके पास बात करने की
एक दूसरे को देते है सांत्वना
चलो खुश होंगे बच्चे जहाँ है
समय मिलेगा तो आएंगे जरूर
फिर गूंजेगा छत सीढ़ी घर
बच्चों के शोर से
की बच्चे बड़े हो गए
और उड़ गए है घोसला छोड़ के
कुछ तलाशने कुछ पाने
घर में बूढी बची आँखे
इंतज़ार में है
की फिर हरे होंगे गमलो में सूखते हुए पौधे

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